वह दिन!

क्या दिन था!
तारीख थी 21 जून 2016। तारीख इसलिए याद है क्योंकि संयोग से उस दिन ‘अंतर-राष्ट्रीय योग दिवस’ भी था। पर अगर न भी होता तब भी याद रहता। बात ही ऐसी थी कि याद जिसे रखे मन।

मेरा पहला इफ्तार!

यह कहते ही, मशहूर शायर, राहत इंदौरी कि एक पंक्ति याद आती है-

“वो रोज़ा नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है।”

हुआ यूँ कि मैं एक सहेली के यहाँ गई। चलते- चलते इफ्तार का वक्त हो गया। सहेली ने कहा कि अब तो इफ्तार करके ही जाना पड़ेगा। मना किया( आखिर राहत जी की वह पंक्ति जो याद आ गई थी) पर वह नहीं मानी। बस फिर बैठ गई खाने।

और, क्या खाना था। क्या ही खाना था!
ख़जूर, पकौड़े, पापड़, आम, जामुन, शरबत, तरह-तरह लज़ीज़ पकवान; इतने लज़ीज़ कि अगर उदर अनुमति दे तो ज़िन्दगी भर खाते ही रहो। इस पर ख़ातिरदारी तो ऐसी, जैसी किसी शहंशाह की भी न हो।
इतना आब- ओ- अदब!

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मेरी दोस्त! मेरे पहले इफ्तार के लिए शुक्रिया! 

अब अगली बार के लिए कोशिश है कि रोज़ा रखकर इफ्तार का लुत्फ उठा सकूँ।

ख़ुदा हाफ़िज़।