धुँधला जहाँ

चश्मा मैं उतार कर रख दूँ यहीं,
फिर देखूँ ये जहाँ,
कि ये जहाँ धुँधला ही सही..

जो हो रहा हो गलत, दिखे मुझे ठीक
चाहे हो ऐसा एक पल के लिए ही अभी
… कि ये जहाँ धुँधला ही सही…

झूठ में ही, देखूँ जब कोई नारी, तो दिखे
ऐसी नारी, डर-भय से जो दूर रही
… कि ये जहाँ धुँधला ही सही…

नजर पड़े न मेरी शख्स की चालाकी पर
दिखे तो दिखे सिर्फ पाक शख्स वही
… कि ये जहाँ धुँधला ही सही…

दिखे मुझे ऐसा जहाँ, जहाँ जंग, अशान्ति,
नफरत सब रहमत की जुस्तजू में बही
… कि ये जहाँ धुँधला ही सही…

दिखे मुझे अपनी शक्ल आइने में
पर शक्ल पर मुरझाई हंसी नहीं
… कि ये जहाँ धुँधला ही सही…

चश्मा मैं उतार कर रख दूँ यहीं,
फिर देखूँ ये जहाँ,
कि ये जहाँ धुँधला ही सही
धुँधला ही सही…

Advertisements

अभिभावक

पल प्रतिपल बच्चे बढते चले जाते हैं

इस तथ्य को वे नहीं स्वीकार पाते हैं

शायद इसलिये ही, उनके लिये,

बच्चे बड़े नहीं, कपड़े छोटे हो जाते हैं..

वह दिन!

क्या दिन था!
तारीख थी 21 जून 2016। तारीख इसलिए याद है क्योंकि संयोग से उस दिन ‘अंतर-राष्ट्रीय योग दिवस’ भी था। पर अगर न भी होता तब भी याद रहता। बात ही ऐसी थी कि याद जिसे रखे मन।

मेरा पहला इफ्तार!

यह कहते ही, मशहूर शायर, राहत इंदौरी कि एक पंक्ति याद आती है-

“वो रोज़ा नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है।”

हुआ यूँ कि मैं एक सहेली के यहाँ गई। चलते- चलते इफ्तार का वक्त हो गया। सहेली ने कहा कि अब तो इफ्तार करके ही जाना पड़ेगा। मना किया( आखिर राहत जी की वह पंक्ति जो याद आ गई थी) पर वह नहीं मानी। बस फिर बैठ गई खाने।

और, क्या खाना था। क्या ही खाना था!
ख़जूर, पकौड़े, पापड़, आम, जामुन, शरबत, तरह-तरह लज़ीज़ पकवान; इतने लज़ीज़ कि अगर उदर अनुमति दे तो ज़िन्दगी भर खाते ही रहो। इस पर ख़ातिरदारी तो ऐसी, जैसी किसी शहंशाह की भी न हो।
इतना आब- ओ- अदब!

20160621_190735.jpg
मेरी दोस्त! मेरे पहले इफ्तार के लिए शुक्रिया! 

अब अगली बार के लिए कोशिश है कि रोज़ा रखकर इफ्तार का लुत्फ उठा सकूँ।

ख़ुदा हाफ़िज़।

तो क्या ?!

तो क्या, जब जो चाहा वो मिला नहीं,
जियें हैं अब तक, जीयेंगे अब भी।
तो क्या, जो राह हो ज़रा मुश्किल,
चल रहे हैं अब भी, चलेंगे तब भी।

जाने क्यों ?

जो चाहा वो मिला नहीं,

जो पाया उसकी कदर न की ।

होता है ऐसा क्यों अक्सर,

आती किसी की अहमियत

समझ

उसके खो जाने पर …???

क्या सोचा, क्या हुआ

नींद टूटने के बाद भी नींद आ रही थी । आँखे अपने आप ही बंद हो और खुल रही थीं। डगमगाते पैरों से मैं मम्मी के पास गई। वे ड्राइंग रूम में टी.वी. देख रही थीं ।सोचा टी.वी. देखकर शायद आँखें  खुल जायेंगी। मैं सोफे पर बैठने जा रही थी कि अकस्मात् ही मैं  सेण्टर टेबल (जो कि कांच की बनी थी) से टकरा गई। इसकी वजह मेरी नींद थी जो अभी भी आँखों में थी।

मम्मी -” बेटा ध्यान से …कहीं…”

मैं समझ गई वे आगे क्या कहेंगी। मुझे काफ़ी चोटें लगती रहती थी।मेरे पैरों पर ढेर सारे निशान इसका सबूत थे।इसलिए वे मुझे सचेत रहने के लिए कहती थीं।लेकिन उनके उत्तर ने मुझे निरुत्तर कर दिया और मेरी नींद तुरंत काफूर हो गई।

मम्मी- “कहीं… कांच ना टूट जाये।”

तबीयत

कुछ चीजें वाकई हैरान कर देने वाली होती हैं। यह चीज़ें वक्त- बेवक्त हमारे सामने आ जाती हैं और हमें लाचार बना जाती हैं। ऐसी ही एक चीज़ है- बीमारी! बीमारी के आगे इंसान कितना छोटा है। इसके आगे किसी का अधिकार नहीं चलता।

एक बार जब मैं बीमार पड़ी, तब मुझे यह ख्याल आया-

“ये तबियत की खराबियत
भी गज़ब दिखाती है,
कोई मिलने आऐ न आऐ,
खुद से मिलवा जाती है।”